सर्दी की एक सुबह थी-
मैं आधी जगी, आधी सोयी सी,
नन्हे हाथों से आँखें मलते हुए,
सुनहरे सपनों में खोयी सी,
माँ को ढूंडने रसोई की ओर,
झूमके चली जैसे सावन में मोर |
माँ बैठी चूल्हे के सामने,
रोटीयां बना रही थी गर्म,
चकला, बेलन, अंगीठी, तवा,
से जादू चला रही थी नर्म,
आग में यूँ जब फूल रहे थे,
सपनों से भरे बादल जैसे,
काले कोयले के लाल आंच पर,
नींद भरे आँखों के काजल जैसे,
मैंने हाथ फैलाकर कहा माँ को,
"मुझे भी आटा, मैं भी रोटी" |
माँ ने मुस्करार एक लोई,
डाली मेरे हाथ में छोटी,
मैंने हाथों के बीच दबाके,
बनाया एक नक्षा सा कोई,
माँ को बोला "इसे भी सेंको,
मैंने भी करनी आज रसोई" |
माँ ने हंसकर मेरे नक्शे को,
बड़े प्यार से तवे पे डाला,
पलट पलट के सेंक कर उसको,
यूँ हलके से थाली में निकला,
फिर झूठ मूठ ही बोली मुझको,
"वाह! बड़ी हो गयी, बिटिया छोटी! "
बड़े दिनों के बाद आज फिर,
एक सर्द सुबह की अंगड़ाई से,
भूले बचपन की गहराई से,
याद आ गयी घर की रोटी ||